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अनुभूति में प्रेम शंकर रघुवंशी की रचनाएँ-

नई कविताएँ
प्रार्थना होता जीवन
भूख और सूरज
ममत्व से दूर
लौटती जनता
स्त्री
हमारा चाहने वाला
हां ना के बीच

गीतों में-
गूंजे कूक प्यार की
नागार्जुन के महाप्रयाण पर
पाकशाला का गीत
सपनों में सतपुड़ा
सिसक रही झुरमुट में तितली

कविताओं में-
इन दिनों
गर्भगृह तक
गांव आने पर
निश्चय ही वहां
महक
मां की याद
मिल बांटकर
सतपुड़ा और उसकी बेटी नर्मदा
हथेलियां

सपनों में सतपुड़ा

मुझको अब भी सपनों में सतपुड़ा बुलाता है।
सघन वनों, शिखरों से ऊँची टेर लगाता है।।

कहता है जब तुम आते थे, उत्सव लगता था
तुम्हें देख गौरव से मेरा, भाल चमकता था
उसका मेरा पिता-पुत्र-सा, गहरा नाता है।।

कभी नाम लेकर पुकारता, कभी इशारों से
कभी ढेर संदेश पठाता, मुखर कछारों से
मेरी पदचापें सुनने को, कान लगाता है।।

गुइयों के संग जब भी मैं, जंगल में जाता था
भर-भर दोने शहद, करोंदी, रेनी लाता था
आज वही इन उपहारों की, याद दिलाता है।।

एक बार तो सपने में वो, इतना रोया था
अपनी क्षत विक्षत हालत में, खोया-खोया था
वह सपना चाहे जब मेरा, दिल दहलाता है।।

भूखे मिले पहाड़ी झरने, मन भर आया है
बोले पर्वत और हमारी सूखी काया है
अब तो बनवारी ही वन का तन कटवाता है।।

24 जुलाई 2006

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