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तीन होली रचनाएँ-
छोड़ दे अब तो
रूप तुम्हारा
होली

अंजुमन में-
अपना जीवन
किस्मत ने
परदा इतना झीना कैसा
बैर
मुझपे अगर नज़र
मेहनत का पैगाम
याद जब आए
हादसे

कविताओं में-
बावजूद इसके

संकलन में—
वर्षा मंगल–बरखा रानी

  रूप तुम्हारा

रूप तुम्हारा जैसे होली।
जीवन के रंगों की टोली।

तुम दाता का वरदहस्त हो,
मैं फकीर की खाली झोली।

बिकने को तैयार खड़ा हूँ,
खोलो तो दिल खोल के बोली।

कुदरत का वरदान हो तुम तो,
मैं मानो किस्मत की ठिठोली।

बच्चे की मुस्कान हो जैसे
हो उतनी पावन और भोली।

१ मार्च २००६

 

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