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नई रचनाओं में—
उम्र आधी हो चली है
ऐसा लगता है

क्या हुआ
मुकद्दर उसके जैसा

अंजुमन में—
झुलसता देखकर
न इसकी थाह है
नदी
नसीबों पर नहीं चलते
ना उम्मीदी में
पेड़ कटे तो
वहाँ पर
समंदर
हज़ारों बार गिरना है
हमारे ख्वाब की दुनिया

दोहों में—
छे दोहे

हाइकु में—
आठ हाइकु
होली हाइकु

  हज़ारों बार गिरना है

हज़ारों बार गिरना है सँभलना है
मगर हर बार कुछ आगे निकलना है।

यही दुनिया बहुत बदली है पहले भी
इसी दुनिया को अब फिर से बदलना है।

कुचल डाले हमें गम़ इससे भी पहले
किसी सूरत हमें गम़ को कुचलना है।

कोई उम्मीद मत ज्वालामुखी से कर
कि उसका काम ही लावा उगलना है।

ढला मिट्टी में तो सब रौंद डालेंगे
तुझे तो सिर्फ़ चट्टानों में ढलना है।

मचलता है तो सूरज के लिए मचले
किसी जुगनू की खातिर क्या मचलना है।

हमारा एक मकसद रोशनी है, बस
हमें सूरज सरीखे रोज़ जलना है।

१ मई २००५

 

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