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अनुभूति में धर्मेन्द्र कुमार सिंह 'सज्जन' की रचनाएँ-

नयी रचनाओं में-
खुदा के साथ यहाँ
गगन का स्नेह पाते हैं
जाल सहरा पे
महीनों तक तुम्हारे प्यार में
मैं तुमसे ऊब न जाऊँ

क्षणिकाओं में-
बारह क्षणिकाएँ

अंजुमन में-
अच्छे बच्चे
कहे कौन उठ
काश यादों को करीने से
गरीबों के लहू से
चंदा तारे बन रजनी में
चिड़िया की जाँ
छाँव से सटकर खड़ी है धूप
जितना ज्यादा हम लिखते हैं
जो भी मिट गए तेरी आन पर
दिल है तारा
दे दी अपनी जान
निजी पाप की
बाँध
मिल नगर से

मौसम तो देखिये

छंदमुक्त में-
अम्ल, क्षार और गीत
दर्द क्या है
मेंढक
यादें
हम तुम

 

गगन का स्नेह पाते हैं

गगन का स्नेह पाते हैं, हवा का प्यार पाते हैं
परों को खोलकर अपने, जो किस्मत आजमाते हैं

फ़लक पर झूमते हैं, नाचते हैं, गीत गाते हैं
जो उड़ते हैं उन्हें उड़ने के खतरे कब डराते हैं

परिंदों की नज़र से एक पल बस देख लो दुनिया
न पूछोगे कभी, उड़कर परिंदे क्या कमाते है

फ़लक पर सब बराबर हैं यहाँ नाज़ुक परिंदे भी
अगर हो सामना अक्सर विमानों को गिराते हैं

जमीं कहती, नई पीढ़ी के पंछी भूल मत जाना
परिंदे शाम ढलते घोसलों में लौट आते हैं

१ मई २०१६

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