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अनुभूति में बोधिसत्व की रचनाएँ-
आएगा वह दिन भी
इलाहाबाद की बाँध रोड पर
छोटा आदमी
जागा वह बूढ़ा
दिन हुए घर से निकले
बो दूँ कविता

 

 

छोटा आदमी

छोटी-छोटी बातों पर
नाराज हो जाता हूँ,
भूल नहीं पाता हूँ कोई उधार,
जोड़ता रहता हूँ
पाई-पाई का हिसाब

छोटा आदमी हूँ
बड़ी बातें कैसे करूँ?

माफ़ी माँगने पर भी
माफ़ नहीं कर पाता हूँ
छोटे-छोटे दुखों से उबर नहीं पाता हूँ।

पाव भर दूध बिगड़ने पर
कई दिन फटा रहता है मन,
कमीज़ पर नन्हीं खरोंच
देह के घाव से ज़्यादा
देती है दुख।

एक ख़राब मूली
बिगाड़ देती है खाने का स्वाद
एक चिट्ठी का जवाब नहीं
देने को याद रखता हूँ उम्र भर

छोटा आदमी और कर ही क्या सकता हूँ
सिवाय छोटी-छोटी बातों को याद रखने के।

सौ ग्राम हल्दी,
पचास ग्राम जीरा
छींट जाने से तबाह नहीं होती ज़िंदगी,
पर क्या करूँ
छोटे-छोटे नुकसानों को गाता रहता हूँ
हर अपने बेगाने को सुनाता रहता हूँ
अपने छोटे-छोटे दुख।

क्षुद्र आदमी हूँ
इंकार नहीं करता,
एक छोटा-सा ताना,
एक मामूली बात,
एक छोटी-सी गाली
एक ज़रा-सी घात
काफ़ी है मुझे मिटाने के लिए,

मैं बहुत कम तेल वाला दीया हूँ
हल्की हवा भी बहुत है
मुझे बुझाने के लिए।

छोटा हूँ,
पर रहने दो,
छोटी-छोटी बातें कहता हूँ- कहने दो।

24 अक्तूबर 2007

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