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आएगा वह दिन भी
इलाहाबाद की बाँध रोड पर
छोटा आदमी
जागा वह बूढ़ा
दिन हुए घर से निकले
बो दूँ कविता

 

 

 

आएगा वह दिन भी

आएगा वह दिन भी
जब हम एक ही चूल्हे से
आग तापेंगे।

आएगा वह दिन भी
जब मेरा बुखार उतरता-चढ़ता रहेगा
और तुम छटपटाती रहोगी रात भर।

अभी यह पृथ्वी
हमारी तरह युवा है
अभी यह सूर्य महज़ तेईस-चौबीस साल का है
हमारी ही तरह

इकतीस दिसंबर की गुनगुनी धूप की तरह
देर-सबेर आएगा वह दिन भी
जब किलकारियों से भरा
हमारा घर होगा कहीं।

24 अक्तूबर 2007

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