अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में चाँद शेरी की रचनाएँ—

नई रचनाओं में-
अपने जीवन में
काले काले बादल भी ला
बरसात होगी
लोग जिसको ताज पहनाने चले
सहमी सहमी

अंजुमन में—
अमृत का पियाला
आज का रांझा
चंदन तन
मुल्क
वक्त भी कैसी पहेली
शहरे वफ़ा

 

सहमी सहमी

सहमी-सहमी है सड़क पर ज़िंदगी
हादसों ने की है दूभर ज़िंदगी।

यों घिरी है दायरे में वक्त के
कैद लगती है कलेण्डर ज़िंदगी।

रिस रहा है आदमी नासूर सा
सड़ रही है कोढ़ बनकर ज़िंदगी।

हर तरफ़ गहरी नशीली साजिशें
बन गई हर गाग तस्कर ज़िंदगी।

झोपड़ों में साँस लेना भी कठिन
और महलों में मुअतर ज़िंदगी।

हो दिलों से दूर ’शेरी‘ नफ़रतें
वर्ना होगी बद से बदतर ज़िंदगी।

२४ दिसंबर २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter