अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में अशोक अंजुम की रचनाएँ

नए दोहे-
घुटी घुटी सी कोठरी

दोहों में-
पानी नदिया प्यास

अंजुमन में-
आँसू
गोली की मेहरबानी
धमकियाँ हैं
वो मुझको आँख भरकर
सयानी बिटिया

 

वो मुझको आँख भरकर

वो मुझको आँख भरकर देखता है
बड़ी हसरत से खंजर देखता है

तू जिसमें सिर्फ़ पत्थर देखता है
वहीं पर कोई ईश्वर देखता है

न कोई देख सकता है वहाँ तक
जहाँ तक एक शायर देखता है

तू जो भी कर रहा है बेखुदी में
समझ ले ये कि नटवर देखता है

उसे अपनों से यों नारें मिली हैं
वो सावन में भी पतझर देखता है

मैं पारस तो नहीं, सच बोलता हूँ
णमाना फिर क्यों देखता है

घटायें देखकर खुश हो रहे सब
मगर होरी क्यों छप्पर देखता है

अगर कुछ भी नहीं है बीच अपने
वो फिर क्यों मुझको मुड़कर देखता है

१५ सितंबर २००८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter