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अनुभूति में उमाशंकर तिवारी की रचनाएँ-

गीतों में-
आ गए कुहरे भर दिन
चैन उड़ाती राते
जो हवा में है

रोशनी सड़कें
शाम की रंगीनियाँ

 

 

आ गए कुहरे भरे दिन

आ गए,
कुहरे भरे दिन आ गए।
मेघ कन्धों पर धरे दिन आ गए।

धूप का टुकडा़ कहीं भी
दूर तक दिखता नहीं,
रूठकर जैसे प्रवासी
खत कभी लिखता नहीं,
याद लेकर
सिरफिरे दिन आ गए।

दूर तक लहरा रही आवाज़
सारस की कहीं है,
सुबह जैसे गुनगुनाकर श्वेत
स्वेटर बुन रही है,
आँख मलते
छोकरे दिन आ गए।

इस शिखर से उस शिखर तक
मेघ-धारा फूटती है,
घाटियों के बीच जैसे
रेलगाड़ी छूटती है,
भाप पीते मसखरे दिन
आ गए।

एक धुँधला पारदर्शी जाल
धीवर तानता है,
बर्फ़ को आकाश का रंगरेज़
चादर मानता है,
यों बदलकर
पैंतरे दिन आ गए।

बाँध लेती हर नदी कुछ
सिलसिला-सा हो गया है,
मन पहाड़ी कैक्टस-सा
घाटियों में खो गया है,
नग्न होते
कैबरे दिन आ गए।

१० जनवरी २०११

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