अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में रामेश्वर शुक्ल 'अंचल' की रचनाएँ

गीतों में-
काँटे मत बोओ

अंजुमन में-
धुंध डूबी खोह

कविताओं में-
काँटे मत बोओ
काननबाला
चुकने दो
तुम्हारे सामने
तृष्णा
द्वार खोलो
दीपक माला

पास न आओ
पावस गान
फिर तुम्हारे द्वार पर
मत टूटो
मेरा दीपक
ले चलो नौका अतल में

संकलन में
ज्योति पर्व-दीपावली
ज्योति पर्व- मत बुझना
तुम्हें नमन-बापू
ज्योतिपर्व- दीपक मेरे मैं दीपों की

  धुंध डूबी खोह

रात का पहरा लगा हो जिस तरह आकाश में
हैं बँधी वैसी हदें दिन के प्रगल्भ प्रकाश में

खून उतरेगा न आँखों में सितारों की कभी
बँध गए है इस तरह वे चाँदनी के पाश में

ज़िंदगी बेथाह सपनों की रंगीली पांत थीं
धुंध-डूबी खोह जैसी धँस गई संत्रास में

लग रही थी जो उदधि की रत्न-लहरों की बनी
है वही अब तो समाई स्तब्धता के ग्रास में

इस तरह खामोश दोहराते तुम्हें कब तक रहें
तुम ठहरते हो न जब पल भर किसी विश्वास में

वेग मुझमें या भले ही शैल-तटिनी का मगर
घूँट बन कर छन गया निर्मम समय की प्यास में

गूँजते ही रह गए ताउम्र जिस झंकार में
आज मुरझाने लगी वह रागिनी उपहास में

डूब मेरे ही अतल में जाय मेरी आत्मजा
जी सकेगी कब तलक अभिव्यक्ति के उपवास में

पर फ़रिश्तों और परियों को दिये, अच्छा किया
पंख क्यों कतरे विहगों के भरे मधुमास में!

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter