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अनुभूति में जतिन्दर परवाज की रचनाएँ-

अंजुमन में-
आँखें पलकें गाल भिगोना
ख्वाब देखे थे
गुमसुम तनहा
जरा सी देर में
शजर पर एक ही पत्ता
सहमा सहमा

  आँखें पलकें गाल

आँखें पलकें गाल भिगोना ठीक नहीं
छोटी-मोटी बात पे रोना ठीक नहीं

गुमसुम तन्हा क्यों बैठे हो सब पूछें
इतना भी संजीदा होना ठीक नहीं

कुछ और सोच ज़रीया उस को पाने का
जंतर-मंतर जादू-टोना ठीक नहीं

अब तो उस को भूल ही जाना बेहतर है
सारी उम्र का रोना-धोना ठीक नहीं

मुस्तक़बिल के ख़्वाबों की भी फिक्र करो
यादों के ही हार पिरोना ठीक नहीं

दिल का मोल तो बस दिल ही हो सकता है
हीरे-मोती चाँदी-सोना ठीक नहीं

कब तक दिल पर बोझ उठाओगे 'परवाज़'
माज़ी के ज़ख़्मों को ढ़ोना ठीक नहीं

२ नवंबर २००९

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