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अभिव्यक्ति   ९. ६. २००८

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बाबू जी

घर की बुनियादें दीवारें बामो-दर थे बाबू जी
सबको बाँधे रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी

तीन मुहल्लों में उन जैसी कद काठी का कोई न था
अच्छे ख़ासे ऊँचे पूरे क़द्दावर थे बाबू जी

अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है
अम्मा जी की सारी सजधज सब ज़ेवर थे बाबू जी

भीतर से ख़ालिस जज़बाती और ऊपर से ठेठ पिता
अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी

कभी बड़ा सा हाथ खर्च थे कभी हथेली की सूजन
मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी

-आलोक श्रीवास्तव

इस सप्ताह

पितृ दिवस के अवसर पर विशेष संकलन- पिता की तस्वीर में पिता को समर्पित २९ रचनाएँ

और

गीतों में-
वरिष्ठ गीतकार यतीन्द्र 'राही' के दस नए अप्रकाशित गीत

पिछले सप्ताह
२ जून २००८ के अंक में

गीतों में-
पूर्णिमा वर्मन

छंदमुक्त में-
शैलेंद्र चौहान

इस माह के कवि में-
वीरेंद्र जैन

अंजुमन में-
आलम खुरशीद

हाइकु में-
अरविंद चौहान

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