वसंती हवा

वसंत का एक दिन (सॉनेट)
--त्रिलोचन

 

 

गेहूँ जौ के ऊपर सरसों की रंगीनी
छाई है, पछुआ आ आ कर इसे झुलाती
है, तेल से बसी लहरें कुछ भीनी भीनी
नाक में समा जाती हैं, सप्रेम बुलाती
है मानो यह झुक-झुक कर। समीप ही लेटी
मटर खिलखिलाती है, फूल भरा आँचल है,
लगी किचोई है, अब भी छीमी की पेटी
नहीं भरी है, बात हवा से करती, बल है
कहीं नहीं इस के उभार में। यह खेती की
शोभा है, समृद्धि है, गमलों की ऐयाशी
नहीं है, अलग है यह बिल्कुल उस रेती की
लहरों से जो खा ले पैरों की नक्काशी।
यह जीवन की हरी ध्वजा है, इसका गाना
प्राण प्राण में गूँजा है मन मन का माना।

११ फरवरी २००८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter