वसंती हवा

वसंत आया
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला 

 

सखि, वसंत आया!

भरा हर्ष वन के मन
नवोत्कर्ष छाया
सखि, वसंत आया!

किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय उर तरु-पतिका,
मधुप-वृंद बंदी
पिक-स्वर नभ सरसाया
सखि, वसंत आया!

लता-मुकुल हार गंध-भार भर,
बही पवन बंद मंद मंदतर
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया
सखि, वसंत आया!

आवृत सरसी उर सरसिज उठे
केशर के केश कली के छुटे
स्वर्ण शस्य अँचल
पृथ्वी का लहराया
सखि, वसंत आया!

२४ मार्च २००५

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