वसंती हवा

ऋतु का शृंगार है
भगवत शरण श्रीवास्तव 'शरण'

 

आया ऋतु राज आज ऋतु का शृंगार है
मन मोहक साज़ साज़ बिखरी बहार है
डाल रहा फूल फूल देखो गले हार है
कैसा लुभावना ये रूप तेरा करतार है

वृक्षों ने पीत पीत पाँवड़े बिछाए हैं
प्रिय बसंत आया अनंत अब बहार है
कलियाँ अलियों को देख फूली न समाती हैं
खेत खेत झूम रही सरसों कचनार है

गिरि से सरिता चलती इठलाती बलखाती
इठलाती जल से ही जल की जलधार है
ऋतु कंत का रूप लख दिग के दिगपाल ने
हर दिस का देखो आज खोला हर द्वार है

'शरण' मिली ऋतु को अब फूली न समाती है
बासंती खड़ी किए सोलह सिंगार है
जिधर भी निहारो आज वसुधा है झूम रही
देखो हर कलिका पर रूप है निखार है।

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