वसंती हवा

केसर चंदन चाँदनी
--राजनारायण चौधरी

 

 

फिर अल्हड़ चैती हवा थिरक रही चहुँ ओर।
धूप उधर मुस्का रही लिए नेह की डोर।।

महुआ फूला बाग में गदराया है नीम।
तितली पंख पसार कर बाँटे खुशी असीम।।

महके सभी कदंब-वन, बँसवट करे कलोल।
चूम तटों को उमगती रह-रह लहरें लोल।।

हुए बावरे आम्र-तरु लिए आम के बौर।
ख़्वाबों का दरिया बहा डूब गया हर ठौर।।

केसर, चंदन, चाँदनी, शोख हुई है धूल।
मत्त हुआ झरबेर तो, भूला होश बबूल।।

रेशम वाली लच्छियाँ बँधा गाँठ अनुराग।
जंगल-जंगल फैलने लगी टेसुई आग।।

११ फरवरी २००८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter