वसंती हवा

होली में
जगदीश प्रसाद सारस्वत 'तैयब'

 

1
बिना मले गुलाल होली में।
हो गए लाल-लाल होली में।।

तिरछी चितवन बोलती आँखें
हो गई लाल-लाल होली में।।

तंग दामन में अंग सिंदूरी
देखिए ये जमाल होली में।।

डाल देता है रंग अपनापन
क्यों भला हो मलाल होली में।।

किसने क्यों रंग आप पर डाला
पूछिए मत सवाल होली में।।

इनकी साड़ी है रंग में भीगी
उनका भीगा रुमाल होली में।।

है गुज़ारिश ये आपसे तैयब
दिल को रखिए सम्हाल होली में।।

1 मार्च 2007

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter