वसंती हवा

आकुल वसंत
डॉ. सुरेशचंद्र शुक्ल

 

आओ रुको यहाँ
कुछ देर बंधु!
समय ने
बाँधे कुछ सेतु बंधु!
आकुल वसंत
अपने गाँव बंधु!
मिलेगी यहाँ सबको छाँव बंधु!

क्षितिज पर चमकें
केसरी धूप के पैबंद
बसंत बयार गुनगुनाए
स्मृति की पगडंडियों पर
जीवन के छंद बंधु!

निमकौली में रसाबोर कोयल
कुहू कुहू के मधुर रस घोल
पीले वसनों में
पीहर अनमोल
नदियों को मिलना
सिंधु एक दिन
किनारों को जोड़ते सेतु बंधु!

महुआ महके
फूल उठें आमों के बौर
खिलते हैं कचनार और कनेर
पीले-पीले सरसों के फूलों ने
खेतों के पीले किये हाथ बंधु!

आकुल वसंत अपने गाँव बंधु!
मिलेगी यहाँ सबको छाँव बंधु!

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