अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में विवेक ठाकुर की रचनाएँ-

छंदमुक्त में-
रूप तेरा
मैं बढ़ता ही जाऊँगा
बापू जब तुम रोए थे

 

 

बापू जब तुम रोए थे

लालकिले पर जब तिरंगा फहराया था
भारत में स्वतंत्रता का परचम लहराया था
स्वतंत्र होने की खुशी में हम पागल थे
खूब पटाखे छोड़े हमने, हर्षोल्लास के कायल थे
तुम्हारा खयाल न आया उस वक्त हमें
इतने झूमे थे, नाचे थे, खुशी में खोये थे
बापू, जब तुम रोए थे
हम अचेतन हो सोए थे।

हिन्दुस्तान में स्वराज तुम्ही ने लाया था
सही मायने में स्वतंत्रता का अहसास कराया था।
सर्वस्व दान कर अपना तुमने लड़ी ये लड़ाई थी
बिना खड्ग ढाल के आजादी हमें दिलाई थी।
फिर भी अपने सगों के छोड़ चले जाने के विरह में
१५ अगस्त १९४७ को हैदरी मैनशन में
बापू, जब तुम रोए थे
हम अचेतन हो सोए थे।

१० सितंबर २००४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter