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अनुभूति में संजीव कुमार बब्बर की रचनाएँ-

छंदमुक्त में-
आँधी
अपाहिज
क्यों फैला है भ्रष्टाचार
मुस्कुराना ज़रूरी है
याद आई

  अपाहिज

यहाँ हर मानव अपाहिज है
मैं भी अपाहिज हूँ
तुम भी।
यहाँ कोई गूँगा कोई बहरा
और कोई अंधा है।

कल शान्ति की इज्ज़त लुटी
शर्मा जी ने आँखें बंद कर लीं
वर्मा जी को कुछ सुनाई न दिया
और मैं कुछ बोल न सका।

जब प्रेम का गला दबाया गया था
तब भी ऐसा ही हुआ था।
यही नहीं
जब ईमान सरे आम लूटा गया था
तब भी हम कुछ न कर सके थे
क्यों कि अब हम

अपाहिज बन चुके हैं
ना अब हमें
किसी की चीखें सुनाई देती हैं
न किसी के आँसू दिखाई देते हैं
और
न हम अन्याय के सामने
कुछ बोल सकते हैं। 

१५ सितंबर २०००

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