अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में डॉ. शैलेन्द्र कुमार सक्सेना की रचनाएँ-

छंदमुक्त में-
पथिक
मैं संवेदनाओं से पूरित

 

मैं संवेदनाओं से पूरित

मैं संवेदनाओं से पूरित हूँ.
प्रेम से सिंचित हूँ।
माया मोह से घिरा
स्वार्थी भी किंचित हूँ।
साहस रखकर भी
पथ की दुरूहता से घबराता हूँ
पर न जाने
किस अज्ञात शक्ति से प्रेरित
आगे बढ़ा जाता हूँ
संबंधों की निकटता को
विस्मृत नहीं कर पाता हूँ
सम्मुख व्यक्ति के भावानुसार
अनुकूलित हो जाता हूँ
कठिनाइयों में से
बढ़ने को स्वप्न दृष्टा हूँ
रचनाओं को गढ़ने में
समय काल का सृष्टा हूँ
आत्म संतोष मिलता है
किसी असहाय का अवलंबन बनकर
पीड़ा होती है
इस विकृत व्यवस्था के बड़े–बड़े छिद्रों पर
पर क्या मैं इस काल के लिए
कुछ विशेष कर पाऊँगा
अंततः एक सामान्य मानव हूँ
मिथ्या जगत से उत्पन्न
इसी में विलीन हो जाऊँगा।

२४ नवंबर २००५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter