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अनुभूति में नम्रता शुक्ला 'क्रांति' की
रचनाएँ -

वो राहें
तुम फूलों सी कोमल हो
हाँ मुझे है प्रतीक्षा

 

हाँ मुझे है प्रतीक्षा

है प्रतीक्षा.,
एक आशियाने की
जो मुझे धूप और सर्दी से ही नहीं,
बल्कि बुरी नज़र और आवाज़ से भी छिपाए।
है प्रतीक्षा
एक ऐसे स्वप्न की
जो मुझे सिर्फ़ सोची हुई बातें ही नहीं,
भविष्य के गर्त में छिपे मोती भी दिखाए।
है प्रतीक्षा
एक ऐसे परिवर्तन की
जो मात्र भौतिकता में ही नहीं,
आत्म अभिव्यक्ति में भी नयापन लाए।
है प्रतीक्षा,
एक ऐसे सव्य की
जो केवल झूठ को ही नहीं,
बल्कि कष्टदायी सत्य को भी झुठलाए।
है प्रतीक्षा,
एक ऐसे अपनत्व की
जो केवल अपनों को ही नहीं,
वरन, पुरी वसुधा को एक सूत्र में सजाए।
है प्रतीक्षा
हाँ है प्रतीक्षा
मुझे एक ऐसे प्रेम की,
जो मेरा ही नहीं,
सृष्टि का प्रेमी कहलाए।

१६ मार्च २००९

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