अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में गौतम जोशी की रचनाएँ

अलग मंज़िलें
खेल आया हूँ
बचपन
बस तुझे चाहती हूँ
मलाल करते हैं
सरकारी

 

अलग मंज़िलें

बहुत अलग हैं मंज़िलें ये कुछ मेरी
गर तुम साथ हो तो बात होगी
बड़ी बेखुदी में कहता हूँ ये हँसकर
गर तुम साथ हो तो बात होगी

अजब-सी ग़ज़ब-सी मेरी ये राहें
माथे पे शिकन, ना दिल में आहें
बड़ी आरजू से माँगा है तुमको
गर तुम साथ हो तो बात होगी

मुख़ातिब हूँ मैं जब, मेरी तिश्नगी से
मिटा लूँ इसे मैं यों हसरत नहीं है
मौजूदगी में तेरी होता है ये अक्सर
गर तुम साथ हो तो बात होगी

ये शामें, ये रातें, ये तन्हाइयों के लम्हे
ये फ़ासले मिटाने में सदियाँ लगेंगी
मेरी हक़ीक़त को मैं भूल जाऊँ
गर तुम साथ हो तो बात होगी।

9 जून 2007

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter