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कविताओं में-
आँसू को रोना आया
आवाहन
बिटिया

 

आँसू को रोना आया

एक बार सब धर्म जाके आँसू से मिले,
कुछ बतलाया
कुछ समझौते की बात कही
वो बोले बाहर की दुनिया को देखो
हमने रंगीन फ़िज़ा बनाई है
लोगों को हमने रंगों के ढंग पे मोड़ लिया
जो केसरिया तिलक है माथे पे ये पहचान हमारी है
और हरियाली देखो झंडे की
अल्लाह की शान निराली है
अब तुम भी मानो बात हमारी
ये रंगहीन तन छोड़ो
हिंदू के बच्चे से निकलो केसरिया गुलाल-सा
और हरा अबीर आँखों मैं भरकर मुस्लिम आँखों से रुखसत हो
वो बोले ये बिना रंग का आँसू हमको अन्दर तक दहलता है
और बाहर से पोते मन को मानव की याद दिलाता है
सुनकर ये सारी अभिलाषा
कुछ पल को आँसू रो ही दिया
और बोला
मैं बन भाव किसी के अंतस से,
इंसा की जुबाँ में कहता हूँ
मिलन झील-सा हो जाता, संग विरह के रहता हूँ
और झूट ने ओढी हो चादर लाल हरी
मैं तो नग्न सत्य-सा बहता हूँ
इस रंग बिरंगी दुनिया में मैं बेरंगा ही ढंग का हूँ...

२१ जुलाई २००८

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