अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में दिव्यांशु शर्मा की रचनाएँ— 

कविताओं में-
इकहरी सड़क
एक प्याली सैलाब
चाँद और उपमान
ज़रूरत

माँ
रक्षाबंधन
मुफ़लिस

  चाँद और उपमान

ओ चाँद,
तुम्हें जाने कितने सालों महीनों से,
देख रहा हूँ,
ऐसे ही आते हो,
आवारा से,
आ कर बैठ जाते हो,
तारों का जमघट लिए,
मन में रखते हो एक लिप्सा,
कि,
कवि मुझे सराहेंगे,
मुझे उपमान बना लेंगे
जाओ मैं तुम्हें नहीं मानता
जब भी तुम्हें,
इन तारों के साथ,
जुआरी-सा बैठा देखता हूँ,
तो मुझे याद आता है,
पी. डब्ल्यू. डी. ऑफिस का एक क्लर्क,
वो भी तुम्हारी तरह,
पहली को पूरा दिखता है,
और महीना खतम होते होते,
उसका भी पेट और पीठ,
मिल जाते हैं
जैसे तुम,
पखवाड़ों मे रूप बदलते हो,
वो महीनों में..
और एक पहली से दूसरी पहली,
उदय अस्त होता रहता है
नाराज़ ना होना चाँद
तुम अब भी उपमान हो,
अब भी साम्य रखते हो,
एक आम हिंदुस्तानी से।

३ मार्च २००८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter