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अनुभूति में अमित प्रभाकर की रचनाएँ

कविताओं में
ऊँघ रहा यह शहर
बुझा बुझा
मुसकुरा लेना


 

 

मुसकुरा लेना

अरे ओ नौजवानों, व्यस्तता में फँसे इंसानों
तुम आज सब कुछ भूल, थोड़ा मुस्कुरा लेना।

तुम आज भी अपनी गाय बकरियाँ लेकर
आ रहे हो खेतों की मेड़ो पर साँझ ढले
एक बकरी जो आज गुम गई उसके लिए
डाँट सुनने की आशंका से हो सभीत भले
ना तुम्हें कुछ पता हो ना तुम्हारे बाबा को
कि ये नया साल हर बार क्यों आता है
इस दिन कोई नहीं रोता कोई डाँटता नहीं
क्यों हर शहरी आज मौज मनाता है
पर तुम बिना विचारे, एक बार मुस्कुरा लेना।

या हो सकता है कि तुम जगो रात भर
कल की तरह दफ्तर के किसी काम से
नया साल के आगमन से बेख़बर, बेखलल
उसी तरह व्यस्त होगे पिछली शाम से
बैठे सामने किसी कंप्यूटर के या मशीन के
तुम्हें अभी इसी तरह कई घंटे और तपना हो
क्योंकि तुम्हारा ऊँचाइयों को छू जाने का
प्रणय की यादों सरीखे, कोई पुराना सपना हो
पर तोड़ अपना ध्यान, एक बार मुस्कुरा लेना।

हो सकता है कि तुम हो घने जंगलों में
तैनात उत्तर या पूरब में कहीं श्रीलंका में
अपने 'ईलम' के ख़्वाब सीने से लगाए
सतत चौकस किसी बाहरी की आशंका में
मैं जानता हूँ, तुम भी इंसा हो, अपनी तरह के
हिटलर हो, मंडेला हो, बुश हो या सद्दाम हो
तुम्हारी भी ज़िंदगी में गम है अपनों का
बेटी की शादी को लेकर तुम भी परेशान हो
पर आज भर, बस आज भर, मुस्कुरा लेना।

७ जनवरी २००८

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