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माटी की गंध‌

कभी अच्छी
तो कभी बुरी
लगती है
माटी की गंध‌।
लगती है
एक‌ सुंदर‌-सी
सुगंध‌,
अगर‌ हो इनमें
खलिहानों, बगानों
के रंग‌।
बन‌ जाती है
यही एक‌
बुरी गंध‌,
रहती है जब‌
ये नालों
के संग‌।
ग़रीबों के झोंपड़ों में
होती है बेमोल‌,
रईसों के आँगन‌ में
हो जाती है ये अनमोल।
बंजर‌ है तो
वीराना ही है
इसका साथी,
उपजाऊ होकर‌
बन‌ जाए ये
किसानॊं कि थाती।
माटी का ये रंग‌
हमें ये सिख‌लाए,
काम‌ अगर
दूसरों के आए,
अच्छी संगत‌
अगर अप‌नाए,
तो फैलेगी
तुम्हारी गंध‌
ब‌न‌के एक सुगंध‌,
और मिट‌ने
से पहले,
माटी में मिलने
से पहले,
जान‌ जाएगा
तेरा ये तन‌
जीवन‌ का
सही रंग‌।

24 जनवरी 2007

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

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