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अनुभूति में हरि बिंदल की रचनाएँ
हास्य व्यंग्य में-
पत्नी से प्रॉबलम
बेलनटाइन
सात छुटकुल्ले

  सात छुटकुल्ले

लैला मजनूँ

मेरे एक मित्र ने, मुझसे यह कहा,
लैला ओ मजनू में, कोई फ़र्क नहीं रहा,
फ़र्क नहीं रहा, बाल लंबे या छोटे,
दोनों पहन सकते हैं, पाजामा कुर्ते
सर्जरी से अब, यह भी हो सकता है
लैला कभी मजनू, मजनू कभी लैला, बन सकता है।

मरीज़

बोला एक मरीज़ नर्स से, मुझे ठीक ना होना।
अच्छा लगता है मुझको तो, यहीं पड़े रहना।
यहीं पड़े रहना कि, तुमसे मुझे इश्क है।
बोली नर्स अरे! इसमें तो बड़ी रिस्क है!
तुम अब ठीक नहीं होंगे, मैंने जान लिया है।
डॉक्टर करता प्यार मुझे, उसने देख लिया है।

कैदी की सज़ा

कैदी को दी सज़ा जज ने, कान काट लेने की।
अर्ज़ करी कैदी ने जज से, सज़ा माफ़ करने की।
सज़ा माफ़ कर दो हजूर, मैं नहीं देख पाऊँगा।
आँखें तो हैं, जज बोला, क्या कानों से देखेगा?
कैदी बोला, सुनिए जज जी, मैं ये समझाता हूँ।
कानों पर ऐनक लगती है, तभी देख पाता हूँ।

वसूली

बाबू बोला खाना खाकर, मेरी जेब तो खाली।
होटल मालिक ने पीटा, और कर दी बेहाली।
और कर दी बेहाली कि, मारा उसको धक्का।
बैरे ने भी जाकर मारा, बड़े ज़ोर का मुक्का।
मालिक ने पूछा क्यों बे, तूने क्यों मारा था?
बैरा बोला मुझको अपना, टिप वसूल करना था।

पत्नी और रेडियो

पत्नी बोली, क्यों जी, क्यों मुझे बैर करते है?
मेरे आते ही कमरे में, रेडियो बंद करते हैं।
रेडियो बंद करते हैं, क्यों? मुझको बतलाइए।
पति बोला, एक बार में, एक ही सुनना चाहिए।
बोली पत्नी, मेरी बोली, क्या इतनी खलती है?
नहीं प्रिये! रेडियो से ज़्यादा, अच्छी लगती है।

एप्रिल फूल

बेटे ने मम्मी को एप्रिल फूल बनाया,
मैंने कुछ देखा है, मम्मी को बतलाया,
मम्मी को बतलाया, नौकर महरी को चूम रहा था
मम्मी ने डाँटा, क्यों रे, तू ऐसी हरकत करता था?
नौकर बोला, जी, मैं तो पूरे दिन बाहर घूमा था,
बेटा हँसा, एप्रिल फूल, महरी को पापा ने चूमा था।

अंग्रेज़ी नाम

हरी (मैं)से हैरी हुए, जौहरी हो गए जैरी
कजरी कैरी हो गई, लहरी हो गए लैरी
इतने तक तो ठीक था अंग्रेज़ी का संग
फूलचंद जी फूल हुए, बन गया एक व्यंग्य
बन गया एक व्यंग्य, जानकी जैनी हो गई
जगदीश्वर हुए जैक, रुकमनी रैनी हो गई
कहूँ बिंदल जी, नामों की हुई ऐसी खिल्ली
ललिता जी (पत्नी) कहलाएँगी अब मैडम लिल्ली।

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