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नए गीतों में-
आना जाना छोड़ दिया
उलझी वर्ग पहेली जैसा
छोटा बच्चा पूछ रहा है
पुरखों की यादें
रिश्ते बने रहें

गीतों में-
आज अपने गाँव में
इच्छाएँ सारी
कॉलोनी के लोग
धीरे धीरे
पीतलनगरी मुरादाबाद के लिये
मुश्किल भरे कँटीले पथ पर

संकलन में-
ममतामयी- कैसी है अब माँ
 

 

उलझी वर्ग पहेली जैसा

उलझी वर्ग पहेली जैसा
जीवन का हर पल

मन पर हावी हुईं कभी जब
भूखी इच्छाएँ
अस्त-व्यस्त-सी रहीं नित्य ही
सब दिनचर्याएँ

अब है केवल अवसादों का
दलदल ही दलदल

झूठी शान दिखाने की
ऐसी मारा-मारी
कुछ सुविधाओं की एवज में
कर्ज़ चढ़ा भारी

सिर्फ़ तनावों का मरुथल है
कहीं न दिखता जल

ढुलमुल अर्थव्यवस्था के
गहरे गड्ढे पग-पग
आश्वासन के खड़े कंगूरे
भी डगमग-डगमग

इन चुभते प्रश्नों को बोलो
कौन करेगा हल

२ अप्रैल २०१२

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