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अनुभूति में यतीन्द्र राही की रचनाएँ

गीतों में-
उपवन को ही ज्ञात नहीं
कोई उत्सव नहीं मना
बिलकुल बंजर

अंजुमन में-
डरा डरा घबराया दिन

 

उपवन को ही ज्ञात नहीं

कब कब कितने फूल झरे
यह उपवन को ही ज्ञात नहीं।

कितने छले गए
मृगजल को इसकी खबर नहीं
कितने पथ भटके
जंगल को इसकी खबर नहीं

तन पर कितने साँप घिरे
यह चंदन को ही ज्ञात नहीं।

कितने सपने टूटे
उसकी ही पाँखों से पूछो
बिछड़े कितने लोग
चिता की राखों से पूछो

कितनी गिरी बिजलियाँ
यह सावन को ही ज्ञात नहीं।
कब कब कितने फूल झर
यह उपवन को ही ज्ञात नहीं।

१५ सितंबर २००८

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