अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में यतीन्द्रनाथ राही की रचनाएँ

गीतों में-
अभिसार वाले दिन
आबरू घर की
आँख में
उमर को बाँध लो
कहाँ गए
कुछ रुक लो
ख़त में तुमने भेज दिया
चलो चल दें
झर गए वे पात
दिन गए रातें गईं
दूर देश की चित्र सारिका
मधुकलश मधुमास
सज गई है
हमारे रेत के घर
हो गया है प्राण कोकिल

संकलन में-
होली है- दिन होली के

       दिन हुरियारे आए

वसंती हवा- आएँगे ऋतुराज
         आए हैं पाहुन वसंत के






 

 

कुछ रुक लो

कुछ रुक लो
सुन लो,
कुछ कह लो!
ओ सागर की चंचल लहरों!

माना, तुम असीम की धड़कन
नयनों की
अति चंचल चितवन
प्रतिपल उठती-गिरती
पलकें
पवन खेलती
श्यामल अलकें
मायाविन,
हे इंद्रजालिके
कुछ तो ठहरा!

सागर से
भ्रम पर इतराना
पल-पल कूलों से टकराना
झाग उगलती
मुक्त वासना
बाँहों में आकाश बाँधना
क्रूर काल के हाथ डोर है
बनी पताका
मत यों फहरो!

क्षणभंगुर
जीवन की गति है
अथ के साथ
लिखी भी इति है
कुछ ऐसा तो
लिख कर जाएँ
कल के लिए
गीत बन जाएँ
पहले ढको अतल गहराई
फिर,
तटबंधों पर
आ घहरो!

९ जून २००८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter