अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में विष्णु विराट की रचनाएँ-

गीतों में-
कुछ व्यथित सी
प्यार की चर्चा करें
राजा युधिष्ठिर
रोशनी के वृक्ष
वनबिलाव
व्याघ्रटोले की सभाएँ
वेदों के मंत्र हैं
शेष सन्नाटा
सुमिरनी है पितामह की

संकलन में-
ममतामयी- माँ तुम्हारी याद
पिता की तस्वीर- पिता

 

वन बिलाव

वन बिलाव पी गया नदी,
सारा जंगल गवाह है।

जिसकी लाठी में है ज़ोर,
वही हाँक ले जाता ढोर,
शोर करें भेड़ बकरियाँ,
चुप कर दी गर्दनें मरोर,
रोती अभिशापिता सदी,
मुस्काता शहनशाह हैं।

दावानल मचल रहा है,
वन प्रांतर दहल रहा है,
पंछी ची चाँव-चाँव करते,
अजगर कुछ निगल रहा है,
सहम गए बस्ती के लोग
कैसी यह वाह-वाह है?

सुबह शाम अंधकार है,
धुआँ-धुआँ बेशुमार है,
दीपक कमज़ोर है बड़ा,
मंद मियादी बुखार है,
जलता है खा-खा के नीम
राजवैद्य की सलाह है।

१ जनवरी २००६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter