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अनुभूति में विष्णु सक्सेना की रचनाएँ-

नए गीतों में-
आँखों में पाले
जब कभी भी हो तुम्हारा मन
रंग है बसंती
स्वार्थ की दुपहरी में

गीतों में-
छोड़ चली क्यों साथ
तृप्त मयूरी हो ना पाई
दुख में सुख की मधुर कल्पना
मन का कोरा दर्पन
हाथ की ये लकीरें
हो सके तो

  आँखों में पाले

आँखों में पाले तो पलकें भिगो गए
वासंती मौसम भी पतझड़
से हो गए

बीते क्षण बीते पल जीत और हार में
बीत गयी उम्र सबझूठे सत्कार में
भोर और संध्या सब करवट
ले सो गए

जीवन की वंशी में साँसों का राग है
कदमों में काँटे हैं हाथों में आग है
अपनों की भीड़ में सपने
भी खो गए

रीता है पनघट रीती हर आँख है
मुरझाए फूलों की टूटी हर पाँख है
आँधियों को देख कर उपवन
भी रो गए

कितना अजीब फूल काँटे का मेल,
जीवन है गुड्डे और गुड़्यों का खेल,
पथरीले मानव को तिनके
भिगो गए।

१८ जुलाई २०११

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