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अनुभूति में सुरेश कुमार पांडा की रचनाएँ-

दोहों में-
गुलमोहर औ' धूप

गीतों में-
अपने मन का हो लें
अस्तित्व
आज समझ आया है होना
तुम्हारे एक आने से
धूप में
फिर बिछलती साँझ में

भूल चुके हैं

 

 

गुलमोहर औ' धूप

१
आँख मिचौली खेलते, गुलमोहर औ’ धूप ।
तपन उलीचे दोपहर, सूख रहे नलकूप ।।
२
१
उन्मन सी रहने लगी, नदी किनारे नाव ।
सूर्य किरण हरने लगी, काया सुख के ठाँव ।।

२
ताप झरे आकाश से, पके आम औ जाम ।
कृषक तप रहा खेत में, पकी फसल के नाम ।।

३
लिखता सूरज गगन में, पाती के रंग सात ।
तपती धरती अगन में, धूप करे उत्पात ।।

४
धूप निगोड़ी छू गई, हौले से जल गात ।
काया कृष होती गई, नदी, ताल, तरु, पात ।।

५
लहके फूल शिरीष के, बहके बेला गन्ध ।
वेणी सजकर प्रेयसी, लिखती मोहक छंद ।।

६
जल उड़ जाए भाप बन, तन में चढ़ता ताप ।
सुबह कठिन है जेठ की, सन्ध्या तक अभिशाप ।।

१ जून २०२२

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