अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में सुरेन्द्र सुकुमार की रचनाएँ-

गीतों में-
कहानी सुनाने के दिन
गौरैया धूप
चमचा जोरदार
तन तो रेगिस्तानी टीला

मैं कैसे बरसाऊँ पानी

संकलन में-
धूप के पाँव- धूप के पाँव
वर्षा मंगल- सावन की पहली बारिश

  कहानी सुनाने के दिन

मैं कैसे बरसाऊँ पानी
मेरी तो गागर खाली है

तुमने पेड़ धरा के काटे
पोखर ताल सभी हैं पाटे
शहर सभी पत्थर कर डाले
धुआँ छोड़ वाहन फर्राटे
कैसे प्यास बुझाऊँ बोलो
मेरी तो छागल खाली है

मैं कैसे बरसाऊँ पानी
मेरी तो गागर खाली है

नदिया रोती है मेरे बिन
उसको चैन नहीं है पल छिन
सूखी दूब निहारे मुझको
लता कर रही देखो किन किन
इनका दर्द सहा ना जाये
पर मेरा सागर खाली है

मैं कैसे बरसाऊँ पानी
मेरी तो गागर खाली है
1
४ अगस्त २०१४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter