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अंतिम पहर रात का
आओ ऐसा देश बनाएँ
पनघट छूट गया
बजता रहा सितार

गीतों में-
अरे जुलाहे तूने ऐसी
आँगन और देहरी

आरती का दीप
ओ फूलों की गंध
ओ मेरे गाँव के किसान
जिंदगी तुम मिलीं
जिंदगी गीत है
मन मंदिर में
राह में चलते और टहलते
सूत और तकली से

 

ओ मेरे गाँव के किसान

ओ मेरे गाँव के किसान रे
तुझसे ही है ये जीवन प्राण रे
ओ मेरे...

तेरे कठिन परिश्रम से
धरती सोना उपजाये
फसल उगाकर सबका
जग में अन्नदाता कहलाये
तुझसे ही देश की है शान रे
ओ मेरे...

तेरे आँगन में वैषाखी
गीत बसंती गाये
सूरजी की किरणों में चमचम
हरियाली लहराये
तुझसे ही देष का उत्थान रे
ओ मेरे...

जग की खुशहाली खतिर
इक तू ही धान उगाये
भूखा-प्यासा रहकर भी तू
सबकी भूख मिटाये
तुझसे ही देश ये महान रे
ओ मेरे...

२ दिसंबर २०१३

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