अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में श्याम अंकुर की रचनाएँ -

गीतों में-
कौन दे गया
खेत जिगर का
चलती देखी
झेल रहा हूँ
रिश्तों के बीच
लोग यहाँ के
विश्वासों की चिड़िया
 

 

झेल रहा हूँ

झेल रहा हूँ -
आज भी,
मैं अचकन की मार।

पूँजीवादी मूलें गहरी
गहराई में नित-नित उतरी
लगातार बढ़ती जाती है
रोज-रोज ही शोषण गठरी
महँगाई की -
बाढ़ का,
आया नहीं उतार।

बलिदानों को छोड़ा जाता
भावों को बस मोड़ा जाता
जिन हाथों ने हिस्सा माँगा
उनको काटा, तोड़ा जाता
दिल्ली करती -
आ रही,
द्वैत-भाव व्यवहार।

माँ को छोड़ा भाग गये कुछ
लगा देश में आग गये कुछ
कुछ हैं जिनको माटी प्यारी
संस्कारित थे जाग गये कुछ
'अंकुर' -
अपने घाव का,
खुद ही कर उपचार।

१ सितंबर २००८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter