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गीतों में-
क्यों सिंगार बिखरा-बिखरा
जितना खेल सकता खेल
जीते हुए हार जाते हैं
तुम अमर बनो
दिखे नहीं छाया
पूरा देश हमारा घर
मौन किसका दोष
रोशनी का तूर्य बन
वो आँखों की पुतली
सुख हमको डाँटे
 

 

रोशनी का तूर्य बन

मौन की भाषा समझ
चुपचाप रह,
मन व्यथा को खोल मत
चुपचाप सह!

बन शिखर
पर इस धरा से मेल रख,
बाँट अमृत खुद गरल का स्वाद चख।
जलधि मत बन हो नदी-
चुपचाप बह!

वक्त की
आवाज है तू, चेतना बन,
हर दुखी मन की तरल संवेदना बन
हौसला दे ‘साथ हैं‘-
चुपचाप कह!

मत बुझा
दीपक किसी का, सूर्य बन,
इस जगत की रोशनी का तूर्य बन
बर्फ होकर आग-सा
चुपचाप दह!

२८ जनवरी २०१३

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