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कुहासे की शिलाएँ
जिंदगी कठिन तेवर तेरे
दुर्दिन महराज
पत्थर समय
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बैठ लें कुछ देर आओ
यही सिलसिला है
वटवृक्ष पारदर्शी

गीतों में-
इंद्रधनुष यादों ने ताने
जीकर देख लिया
टेढ़ी चाल जमाने की
नदी का बहना मुझमें हो
पुरवा जो डोल गई

मुक्तक में-
सब कुछ वैसे ही

 

जीकर देख लिया

जीकर देख लिया
जीने में
कितना मरना पड़ता है

अपनी शर्तों पर जीने की
एक चाह सबमें रहती है
किन्तु ज़िन्दगी अनुबंधों के
अनचाहे आश्रय गहती है

क्या-क्या कहना
क्या-क्या सुनना
क्या-क्या करना पड़ता है

समझौतों की सुइयाँ मिलतीं
धन के धागे भी मिल जाते
संबंधों के फटे वस्त्र तो
सिलने को हैं सिल भी जाते

सीवन,
कौन कहाँ कब उधड़े
इतना डरना पड़ता है

मेरी कौन बिसात यहाँ तो
सन्यासी भी साँसत ढोते
लाख अपरिग्रह के दर्पण हों
संग्रह के प्रतिबिंब संजोते

कुटिया में
कौपीन कमंडल
कुछ तो धरना पड़ता है

२५ अप्रैल २०११

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