अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में शीलेन्द्र कुमार सिंह चौहान की रचनाएँ— 

गीतों में-
काली बिल्ली ढूँढ रही है
कुटी चली परदेश कमाने
खड़े नियामक मौन
दो रोटी की खातिर
पंख कटे पंछी निकले हैं

 

खड़े नियामक मौन

घुटने टेके खड़े नियन्‍ता
खड़े नियामक मौन

घात लगाये कुर्सी बैठे
टट्टू भाड़े वाले
अपनी बातों में वादों के
सब्‍जबाग हैं पाले
सुरसा सी बढ़ती आबादी
गाफिल लाल तिकोन

ढूँढ रही हर आँख हवा में
एक यही प्रश्‍नोत्‍तर
इतनी बड़ी हवेली आखिर
कब किसने की खँडहर
बन-बबूल से हुए पराजित
देवदार-सागौन

लँगड़ा हाथी, टूटी ढालें
कागज की तलवारें
जंग जीतने चले समय की
लेकर थोथे नारे
घबरायी नजरों से ताके
घिरी चिरैया सोन

१६ मई २०११

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter