अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में रमेशचंद्र शर्मा 'आरसी' की रचनाएँ -

नए गीतों में-
आँख के काजल
उगते सूरज को
यों न ठुकरा
शब्द की इक नदी

गीतों में-
खुद्दारी
चूड़ियाँ
ज़िन्दगी
बसंत गीत

मेरे गीत क्या हैं
सूर्य की पहली किरण हो

अंजुमन में-
काली कजरारी रातों में
मेरे गीतों को


संकलन में-
ममतामयी- माँ कुछ दिन
दिये जलाओ- दिवाली के दोहे

  आँख के काजल

आँख के काजल को मैंने रोशनाई तो बनाया,
पर प्रणय के छ्न्द अब तक गीत में न ढाल पाया ।

यों नूपुर तो पायलों के साँस की लय पर बजे हैं,
बिम्ब सुधियों के सुनहरे आज भी नयनों सजे हैं।
देहरी संकोच की न आज तक लाँघी गई है,
वेणियों में शब्द के गजरे कहाँ मैं बाँध पाया।

दीप मैनें भी जलाये प्रीत के मन द्वार पर,
और हवाओं से बचाए हाथ को दीवार कर।
पर हथेली में कभी न प्रेम की रेखा बनी,
मैंने तो नदिया किनारे रेत का बस घर बनाया।


मन के मन्दिर में बिठाईं मूर्ती पाषाण की,
और अपेक्षा कर रहा था उस से भी वरदान की।
पर हवन करते हुए खुद हाथ अपने ही जले,
हार कर लौटा सदा ही दांव पर मन जब लगाया।
आंख के काजल को मैंने रोशनाई तो बनाया

१९

hit counter
जुलाई २०१०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter