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नये गीतों में-
एक नदी
गीत जल संवेदना के
पाँखुरी नोची गई
मत उदास हो
मैं अकेला ही चला हूँ
शुभ महूरत

गीतों में-
मान जा मन
जादू टोने

शब्द जो हमने बुने

 

एक नदी

एक नदी
बनकर संवेदना
बहना अन्तर्मन के पास

गढ़ना
सम्बन्धों के सेतुबन्ध
ठहरें न मन के उद्गार
आर-पार
जाएँ अनुभूतियाँ
शब्दों का पाकर आधार

लहरों पर
तैरे अभिव्यंजना
नीर-क्षीर करती संत्रास

कल-कल
ध्वनि-पगों को साधना
आए न किंचित अवरोध
यात्रा में
भावुक मंदाकिनी
अधरों पर रखना युग-बोध

अस्ताचल
सूरज के साथ कहीं
डूबे न हिरनों की प्यास

गति-लय
स्वर व्यंजन में बाँधना
अन्तर्मुख अधरों की
पीर बैरागी
बोधिवृक्ष सींचना भर-भरकर

नयनों में नीर
अपनी मृदुभाषिणी तरंगों से
करुणा का लिखना इतिहास

६ अप्रैल २०१५

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