अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में रामदरश मिश्र की रचनाएँ— 

मुक्तक में-
बुढ़ापा- ग्यारह मुक्तक
कुछ मुक्तक

गीतों में-
उम्र की दूर दिशा से
कवि
कैसे लिखता है
कोई नहीं, कोई नहीं
चार बज गए

 

  कवि

आवाज़ों के कोलाहल में भी
तू कुछ गुनता रहता है
सन्नाटे में भी ना जाने
क्या-क्या तू सुनता रहता है!

गठरी-मोटरी लाद दुखों की
ज़िंदगियाँ चलती रहती हैं
कंगाली की कड़ी धूप में
वे नंगी जलती रहती हैं

हँसता रहता आसमान
अपनी निर्दयता का सुख लेकर
उनके लिए आँसुओं से तू
छायाएँ बुनता रहता है

फैला आती हैं कबाड़
धन-मद-माते जलसों की रातें
कितने ही टूटे बसंत
कितनी-कितनी रोती बरसातें

मलबों के भीतर रह-रह
कुछ दर्द फड़फड़ाते-से लगते
अपनी पलकों से प्रभात में
तू उनको चुनता रहता है!

ज़ख़्मी-ज़ख़्मी हवा घूमती
डरा-डरा-सा बहता पानी
लगता है, यह समय हो गया
तम की एक अशेष कहानी

'नहीं, बहुत कुछ अभी शेष है'
तेरे सपनों से धुनि आती
तेरे शब्दों का उजास, तम को
चुप-चुप धुनता रहता है!

१४ सितंबर २००९

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter