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रचनाएँ-

नये गीतों में-
कागज की नाव
कैसा यह जीवन
जादूगरनी
मेरे बस का नहीं
सच की कौन सुने

अंजुमन में-
प्रार्थना ही प्रार्थना
प्रेम का पुष्प
माँ गुनगुनाती है
सत्य निष्ठा के सतत अभ्यास
हम निकटतम हुए

गीतों में-

आँसुओं का कौन ग्राहक
करें तो क्या करें
दिल्ली का ढब
बेच रहा हूँ चने कुरमुरे
बैताल
रौशन बहुत माहौल

दोहों में-
खनक उठी तलवार

 

जादूगरनी

जादूगरनी
छलकती फिरती
रस-गगरी

रस की वर्षा
करती रहती है
घर-घर में
टोने-टुटके
करती रहती है
मृदु स्वर में

मधुपात्रों में
गरल पिलाती है
हर नगरी

जाने कितने
रूप धरे फिरते
रति-अनंग
जर्जर काया
किन्तु गगनचुम्बी
मन-विहंग

रास-रंग में
नख-शिख डूबी है
मति सगरी

चलना होगा
अग्निपथोँ पर भी
तन-मन से
चुनना होगा
बिखरे सौरभ को
कण-कण से

अरी ज़िन्दगी!
सोएगी कब तक?
अब जग, री!

६ जुलाई २०१५

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