अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में पुष्पेन्द्र शरण पुष्प की रचनाएँ-

गीतों में-
अर्थ लगाकर
आज हवाओं का
जबसे मैंने होश संभाला
जीवन में
बहके कदमों से जंगल में

आज हवाओं का

आज हवाओं
देखो कैसा रुख है।
छप्पर को पश्चिम की आँधी का
दुख है।

इस काली
आँधी में जब उड़ जाएँगे।
ना जाने फिर कहाँ किधर मुड़ जाएँगे।
घास फूस से बँधी जेबरी
टूट गई,
बिखरे तिनके फिर कैसे जुड़ पाएँगे।
मन रोता है बहुत-बहुत तन का
सुख है।

झोंपड़ कब
तक अपना फूस बचाएगी।
आँधी तो आँधी है आग लगाएगी।
पक्की मीनारों के
शीशे टूटेंगे।
रूप भयंकर जब अपना दिखलाएगी,
चिंता की है बात हृदय में
धुक-धुक है।

इन खेतों में
आज बहुत हरियाली है।
पुरवैया करती इनकी रखवाली है।
खड़ी फसल कस सत्यानाश नहीं
कर दे,
ब्यार भयंकर आज बहुत मदवाली है।
ये संकट तो पौधे के भी
सम्मुख है।

१६ नवंबर २००५

 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter