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रुपैया रोता है
हम कैसे मानें

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अब सावन ऐसे आता है
अरे रे रे बादल
कर्फ्यू में है ढील
कुम्हड़ा लौकी नहीं चढ़ रहे
गाली देना है अपना अधिकार
चाहे जितने चैनल बदलो
न्याय चाहिये
बूँद बनी अभिशाप

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अंजुमन में-
ख़यालों में

 

रुपैया रोता है

डॉलर चढ़ता जाय
रुपैया रोता है

कई बरस से
हार माँगती घरवाली
हम टरकाते रहे
गई न कंगाली
सोना इकतीस पार
लगाए गोता है

चाँदी का रुपया
बाबा ले आते थे
थोड़ा सा कर खर्च
बचा ले जाते थे
आज उसी चाँदी का
दिखता टोटा है

देखे शेयर दलाल
पेट मोटे वाले
हैं कौड़ी के तीन
आज लटके ताले
बिकने को घर का भी
थाली - लोटा है

पगड़ी-लुंगी
जबतक देश संभालेगी
अर्थव्यवस्था को
दीमक सा चालेगी
भली चुप्प जब अपना
सिक्का खोटा है

२ जून २०१४

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