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अनुभूति में ओम निश्चल की रचनाएँ-

गीतों में-
गुनगुनी धूप है
छुआ मुझे तुमने रूमाल की तरह
जब हवा सीटियाँ बजाती है
नदी का छोर
यह वेला शाम की
लिख रहे हैं लोग कविताएँ
संबंधों की अलगनियों पर

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जब हवा सीटियाँ बजाती है

दूर तक
बस्तियों सिवानों में
गन्ध फसलों की महमहाती है,
जब हवा सीटियाँ बजाती है

एक सहलाव भरी गंध लिये आता है
आता है बालियाँ लिए मौसम
धान का हरापन ठिठकता है,
महक उठता है ख़ुशबुओं से मन
पत्तियों में छिपी कहीं कोयल
धूप के गीत-गुनगुनाती है,
जब हवा सीटियाँ बजाती है

एक खुलती हुई हँसी जैसी
फूटती है उजास मेड़ों से,
दीखते हैं दरख़्त फैले हुए
चाँदनी के हसीन पेड़ों से,
आँख से ओट हो गईं सुधियाँ
पास फिर लौट-लौट आती हैं,
जब हवा सीटियाँ बजाती है

पाट चौड़े हुए नदी के फिर
फिर हवाएँ हुईं सरस-शीतल,
मुट्ठियों से शहद छिड़कता है
द्वार पर सन्त-सा खड़ा पीपल,
दिन रुई-सा इधर-उधर उड़ता
रात अल्हड़-सी मुसकराती है,
जब हवा सीटियाँ बजाती है

९ जनवरी २०१२

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