अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में मधु शुक्ला की रचनाएँ-

छंदमुक्त में-
अनछुआ ही रहा
जाने कहाँ छिप गयी वो
पानी की जंग
मेरे इर्दगिर्द मेरे आसपास
यादों की चील

  अनछुआ ही रहा

सिर्फ तन नहीं थी मैं
तन के भीतर एक मन भी था
तुम्हारी आशाओं और आकांक्षाओं से
भरा हुआ मन
चाहत की अनन्त कल्पनाओं से भरा मन
जो अनछुआ ही रहा
तुम्हारे तमाम स्पर्शो के बाद भी।

मेरे अन्तस में उमगती प्यास की नदी
तलाशती रही तुम्हारी आँखों में
सम्भावनाओं का सागर
टटोलती रही दो बूँद नमी
उलीची हुई सम्वेदनाओं के सूखे समन्दर में।

तुम्हारी उपेक्षाओं की सतह पर तड़पती
इच्छाओं की ये कोमल मछलियाँ
तोड़ती रहीं दम एक-एक कर
और बाँधे हुए, अपनी खाली मुट्ठियों में
तुम्हारे होने का महज भ्रम
देखती रही होते हुये ओझल
अपनी आँखों के दायरों से
तुम्हारी तृष्णा के मृग को
लिप्साओं के मरुस्थलों में।

गुजर जाना चाहती थी मैं
तुम्हारें भीतर से
एक समूची सदी की तरह
पर पलों के पंख लगाये हुये तुम
मँडराते रहे
मन और प्राणों से रहित इन मृत देहों पर
किसी गिद्ध की तरह।

१ जून २०२२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter