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अनुभूति में गुलाब सिंह  की रचनाएँ—

गीतों में—
अपने ही साए
गीतों का होना
दिन
पेड़ और छाया
फूल पर बैठा हुआ भँवरा

शहरों से गाँव गए
हतप्रभ हैं शब्द

 

 

हतप्रभ हैं शब्द

शायद किसी मोड़ पर
ठहर जाए
थककर हाँफती
ज़िन्दगी लौट आए

पीपल के पत्तों तक का
हिलना बन्द है
इस कदर
मौसम निस्पन्द है
हवाओं के झोंके
सिर्फ उठें ‘मसानों से
भटक रही राख
खुली आँखों में पड़ जाए

मंचों पर नाच रही
कठपुतली
मिट्टी खाए मुँह में
डाले टेढ़ी अँगुली
छिः छिः आ आ
माँ बार बार दुहराए
बच्चा बस रो रोकर
मौन मुस्कराए

हतप्रभ हैं शब्द
दया करुणा संवेदना
सब कहते अपने को
दुनिया की आँखों से देखना
कौन सी दुनिया
यही जो मूल्यों के शस्य डाल
खड़ी है दोनो हाथ
उन पर आए

३१ अक्तूबर २०११

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