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गीतों में-
गिलहरी
धूप ने पहने कपड़े कुहरीले

महल पर बादल बरसे हैं
मैं हूँ मौन
मौसम-मौसम में जहर

 

धूप ने पहने कपड़े कुहरीले

सिर पर चढ़ी धूप ने पहने
कपड़े कुहरीले
काँपे तन-मन चुभे शीत के
ये शर जहरीले

चारो ओर धुंध का घेरा
नजर न कुछ आये
राख मले जोगी-सा मौसम
जिसे न जग भाये
दबे पाँव आकर छुप जाते
दिन हैं शर्मीले

वृक्षों और लताओं के अब
पीत हुए पत्ते
इन पत्तों पर गिरे ओस-कण
आँसू-से झरते
उपवन, खेत-मेड़, पगडण्डी
सब गीले-गीले

पंछी दुबक गये कोटर में
सूनी अँगनाई
लेकिन चक्की से चूल्हे तक
नाच रही माई
सर्द अलाव हुआ तो बाबा
हुए लाल-पीले

१८ नवंबर २०१३

 

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